श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 145: नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुन: प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  13.145.38 
क्षणेन हिमवान् सर्व: प्रकृतिस्थ: सुदर्शन:।
प्रहृष्टविहगश्चैव सुपुष्पितवनद्रुम:॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
उनकी दृष्टि उस पर पड़ते ही सम्पूर्ण हिमालय पर्वत क्षण भर में अपनी मूल अवस्था में आ गया। वह देखने में अत्यंत सुन्दर हो गया। प्रसन्नता से भरे पक्षी वहाँ चहचहाने लगे। उस वन के वृक्ष सुन्दर पुष्पों से सुशोभित हो गए। 38।
 
On falling his gaze on it, the entire Himalaya mountain returned to its original state in a moment. It became extremely beautiful to look at. The birds filled with joy started chirping there. The trees of that forest became decorated with beautiful flowers. 38.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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