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mahabharat 13.145.37: उस समय स्त्रियों के स्वभाव ने समुदाय में कोमलता (लज्जा) उत्पन्न कर दी थी। वे अपने पिता की दयनीय दशा देखना नहीं चाहती थीं। उनकी यह दशा देखकर भगवान शंकर ने प्रसन्नतापूर्वक हिमवान् पर्वत की ओर देखा॥37॥   |   mahabharat अध्याय 13.145: नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुन: प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 145: नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुन: प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  13.145.37 
उमां शर्वस्तदा दृष्ट्वा स्त्रीभावगतमार्दवाम्।
पितुर्दैन्यमनिच्छन्ती प्रीत्यापश्यत् तदा गिरिम्॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
उस समय स्त्रियों के स्वभाव ने समुदाय में कोमलता (लज्जा) उत्पन्न कर दी थी। वे अपने पिता की दयनीय दशा देखना नहीं चाहती थीं। उनकी यह दशा देखकर भगवान शंकर ने प्रसन्नतापूर्वक हिमवान् पर्वत की ओर देखा॥37॥
 
At that time, women's nature had created softness (shyness) in the community. She did not want to see her father's miserable condition. Seeing his condition, Lord Shankar looked towards Himavan Mountain with happiness. 37॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)