श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 145: नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुन: प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  13.145.34 
ततो नभस्पृशज्वालो विद्युल्लोलाग्निरुल्बण:।
द्वादशादित्यसदृशो युगान्ताग्निरिवापर:॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
वहाँ जलती हुई अग्नि की लपटें आसमान चूम रही थीं। बिजली की तरह टिमटिमाती हुई वह अग्नि अत्यंत भयावह लग रही थी। वह बारह सूर्यों के समान चमक रही थी और किसी महाविनाश के समान प्रतीत हो रही थी।
 
The flames of the fire burning there were kissing the sky. The fire, which was as flickering as electricity, appeared very terrifying. It shone like twelve suns and appeared like another catastrophe.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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