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mahabharat 13.145.31: तब जलती हुई अग्नि के समान तीसरे नेत्र से युक्त महादेवजी को देखकर गिरिराजनन्दिनी विशाललोचना उमा ने सिर झुकाकर विस्मित नेत्रों से उनकी ओर देखा॥31॥   |   mahabharat अध्याय 13.145: नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुन: प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 145: नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुन: प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  13.145.31 
ततो गिरिसुता दृष्ट्वा दीप्ताग्निसदृशेक्षणम्।
हरं प्रणम्य शिरसा ददर्शायतलोचना॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
तब जलती हुई अग्नि के समान तीसरे नेत्र से युक्त महादेवजी को देखकर गिरिराजनन्दिनी विशाललोचना उमा ने सिर झुकाकर विस्मित नेत्रों से उनकी ओर देखा॥31॥
 
Then seeing Mahadevji equipped with a third eye like burning fire, Girirajnandini Vishallochana Uma bowed her head and looked at him with astonished eyes. 31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)