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mahabharat 13.145.27: जैसे ही उनके दोनों नेत्रों के ढक जाने पर सारा जगत् अचानक अंधकारमय, चेतनाशून्य, अग्नि और वर्षा से रहित हो गया ॥27॥   |   mahabharat अध्याय 13.145: नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुन: प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 145: नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुन: प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  13.145.27 
संवृताभ्यां तु नेत्राभ्यां तमोभूतमचेतनम्।
निर्होमं निर्वषट्कारं जगद् वै सहसाभवत्॥ २७॥
 
 
अनुवाद
जैसे ही उनके दोनों नेत्रों के ढक जाने पर सारा जगत् अचानक अंधकारमय, चेतनाशून्य, अग्नि और वर्षा से रहित हो गया ॥27॥
 
As soon as both his eyes were covered, the whole world suddenly became dark, devoid of consciousness and devoid of fire and rain. 27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)