श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 145: नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुन: प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना  »  श्लोक 23-24
 
 
श्लोक  13.145.23-24 
तमभ्ययाच्छैलसुता भूतस्त्रीगणसंवृता॥ २३॥
हरतुल्याम्बरधरा समानव्रतधारिणी।
बिभ्रती कलशं रौक्मं सर्वतीर्थजलोद्भवम्॥ २४॥
 
 
अनुवाद
उस समय भूतगणों की पत्नियों से घिरी हुई गिरिराज नन्दिनी उमा समस्त तीर्थों के जल से भरा हुआ एक स्वर्ण कलश लेकर उनके पास आईं। वे भी भगवान शंकर के समान वस्त्र धारण किए हुए थीं। वे भी उन्हीं के समान उत्तम व्रतों का पालन कर रही थीं।॥ 23-24॥
 
At that time, surrounded by the wives of the ghosts, Giriraja Nandini Uma came to him carrying a golden pitcher filled with water from all the pilgrimage places. She too was wearing clothes similar to those of Lord Shankar. She too was observing excellent fasts like him.॥ 23-24॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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