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mahabharat 13.145.2-3: नारदजी बोले - 'हे प्रभु! जहाँ सिद्ध और चारण निवास करते हैं, जो नाना प्रकार की औषधियों से युक्त है, तथा नाना प्रकार के पुष्पों से युक्त होने के कारण शोभायमान है, जहाँ अप्सराओं के समूह और भूत-प्रेतों के समूह निवास करते हैं, उस परम पवित्र हिमालय पर्वत पर पुण्यात्मा भगवान शंकर तपस्या कर रहे थे।   |   mahabharat अध्याय 13.145: नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुन: प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 145: नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुन: प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना  »  श्लोक 2-3
 
 
श्लोक  13.145.2-3 
नारद उवाच
तपश्चचार धर्मात्मा वृषभाङ्क: सुरेश्वर:।
पुण्ये गिरौ हिमवति सिद्धचारणसेविते॥ २॥
नानौषधियुते रम्ये नानापुष्पसमाकुले।
अप्सरोगणसंकीर्णे भूतसंघनिषेविते॥ ३॥
 
 
अनुवाद
नारदजी बोले - 'हे प्रभु! जहाँ सिद्ध और चारण निवास करते हैं, जो नाना प्रकार की औषधियों से युक्त है, तथा नाना प्रकार के पुष्पों से युक्त होने के कारण शोभायमान है, जहाँ अप्सराओं के समूह और भूत-प्रेतों के समूह निवास करते हैं, उस परम पवित्र हिमालय पर्वत पर पुण्यात्मा भगवान शंकर तपस्या कर रहे थे।
 
Narada said, 'O Lord! The place where Siddhas and Charans reside, which is full of various kinds of medicinal herbs and appears beautiful because of being full of different kinds of flowers, where hordes of Apsaras reside and groups of ghosts reside; on that most sacred Himalayan mountain, the virtuous God, Lord Shankar was performing penance.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)