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श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 145: नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुन: प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना  »  श्लोक 16-17h
 
 
श्लोक  13.145.16-17h 
विहङ्गाश्च मुदा युक्ता: प्रानृत्यन् व्यनदंश्च ह॥ १६॥
गिरिपृष्ठेषु रम्येषु व्याहरन्तो जनप्रिया:।
 
 
अनुवाद
वहाँ की सुन्दर पर्वत चोटियों पर पक्षी आनन्द से नाचते और चहचहाते थे, तथा ऐसी भाषा बोलते थे जो लोगों को अच्छी लगती थी।
 
On the beautiful mountain peaks there, the birds danced and chirped in joy, speaking a language that was pleasing to the people. 16 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)