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श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 145: नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुन: प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना  »  श्लोक 15-16h
 
 
श्लोक  13.145.15-16h 
ऋतव: सर्वपुष्पैश्च व्यकिरन्त महाद्भुतै:॥ १५॥
ओषध्योज्वलमानाश्च द्योतयन्ति स्म तद् वनम्।
 
 
अनुवाद
वहाँ ऋतुएँ मौजूद थीं और तरह-तरह के सुन्दर फूल बिखेर रही थीं। औषधीय जड़ी-बूटियाँ जगमगा रही थीं और जंगल को रोशन कर रही थीं।
 
The seasons were present there and were spreading all kinds of wonderful flowers. The medicinal herbs were blazing and illuminating the forest.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)