श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 145: नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुन: प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  13.145.10 
प्रनृत्ताप्सरसं दिव्यं देवर्षिगणसेवितम्।
दृष्टिकान्तमनिर्देश्यं दिव्यमद्भुतदर्शनम्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
वहाँ अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं। वह दिव्य सभा ऋषियों के समूहों से सुशोभित थी। वह देखने में सुन्दर, अवर्णनीय, अलौकिक और अद्भुत थी॥10॥
 
The Apsaras danced there. That divine assembly was adorned with groups of sages. It was beautiful to look at, indescribable, supernatural and wonderful.॥ 10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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