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mahabharat 13.145.1: भीष्मजी कहते हैं-युधिष्ठिर! तदनन्तर श्री नारायण के सखा नारदमुनि शंकरजी और पार्वतीजी का जो वार्तालाप हुआ, वह सुनाने लगे। 1॥   |   mahabharat अध्याय 13.145: नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुन: प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 145: नारदजीके द्वारा हिमालय पर्वतपर भूतगणोंके सहित शिवजीकी शोभाका विस्तृत वर्णन, पार्वतीका आगमन, शिवजीकी दोनों आँखोंको अपने हाथोंसे बंद करना और तीसरे नेत्रका प्रकट होना, हिमालयका भस्म होना और पुन: प्राकृत अवस्थामें हो जाना तथा शिव-पार्वतीके धर्मविषयक संवादकी उत्थापना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  13.145.1 
भीष्म उवाच
ततो नारायणसुहृन्नारदो भगवानृषि:।
शङ्करस्योमया सार्धं संवादं प्रत्यभाषत॥ १॥
 
 
अनुवाद
भीष्मजी कहते हैं-युधिष्ठिर! तदनन्तर श्री नारायण के सखा नारदमुनि शंकरजी और पार्वतीजी का जो वार्तालाप हुआ, वह सुनाने लगे। 1॥
 
Bhishmaji says – Yudhishthir! Thereafter, Lord Naradmuni, the friend of Shri Narayana, started narrating the conversation that Shankarji had with Parvati. 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)