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mahabharat 13.144.41-43: महर्षियों! आपकी दृष्टि देवताओं के समान दिव्य है। यद्यपि स्वर्ग में या पृथ्वी पर जो भी दिव्य और अद्भुत वस्तुएँ हैं, जिन्हें आप लोगों ने भी नहीं देखा है, वे सब मैं प्रत्यक्ष देखता हूँ। सर्वज्ञता मेरा उत्तम स्वभाव है। वह कहीं भी बाधित नहीं होती और मुझे जो ऐश्वर्य प्राप्त है, वह मुझे आश्चर्यजनक नहीं लगता। तथापि जो बात सत्पुरुषों के कानों तक पहुँच जाती है, वह विश्वसनीय होती है और वह इस पृथ्वी पर पत्थर पर खींची गई रेखा के समान दीर्घकाल तक बनी रहती है ॥41-43॥   |   mahabharat अध्याय 13.144: तपस्वी श्रीकृष्णके पास ऋषियोंका आना, उनका प्रभाव देखना और उनसे वार्तालाप करना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.144.41-43 
यद्यप्यहमदृष्टं वो दिव्यमद्भुतदर्शनम्।
दिवि वा भुवि वा किंचित् पश्याम्यमरदर्शना:॥ ४१॥
प्रकृति: सा मम परा न क्वचित् प्रतिहन्यते।
न चात्मगतमैश्वर्यमाश्चर्यं प्रतिभाति मे॥ ४२॥
श्रद्धेय: कथितो ह्यर्थ: सज्जनश्रवणं गत:।
चिरं तिष्ठति मेदिन्यां शैले लेख्यामिवार्पितम्॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
महर्षियों! आपकी दृष्टि देवताओं के समान दिव्य है। यद्यपि स्वर्ग में या पृथ्वी पर जो भी दिव्य और अद्भुत वस्तुएँ हैं, जिन्हें आप लोगों ने भी नहीं देखा है, वे सब मैं प्रत्यक्ष देखता हूँ। सर्वज्ञता मेरा उत्तम स्वभाव है। वह कहीं भी बाधित नहीं होती और मुझे जो ऐश्वर्य प्राप्त है, वह मुझे आश्चर्यजनक नहीं लगता। तथापि जो बात सत्पुरुषों के कानों तक पहुँच जाती है, वह विश्वसनीय होती है और वह इस पृथ्वी पर पत्थर पर खींची गई रेखा के समान दीर्घकाल तक बनी रहती है ॥41-43॥
 
Maharishis! Your vision is as divine as that of the gods. Although whatever divine and amazing looking thing is there in the heaven or on earth, which even you people have not seen, I see it all directly. Omniscience is my best nature. It is not hindered anywhere and the opulence that I have does not seem surprising to me. However, the matter that reaches the ears of good men is trustworthy and it remains on this earth for a long time like a line drawn on a stone. ॥ 41-43॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)