श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 143: पाँच प्रकारके दानोंका वर्णन  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  13.143.11 
इति पञ्चविधं दानं पुण्यकीर्तिविवर्धनम्।
यथाशक्त्या प्रदातव्यमेवमाह प्रजापति:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
इन पाँच प्रकार के दानों से पुण्य और यश की वृद्धि होती है। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुसार दान करना चाहिए। यह प्रजापति का कथन है।
 
These five types of donations increase virtue and fame. Everyone should donate according to their capacity. This is the statement of Prajapati.
 
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि अष्टत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १३८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें एक सौ अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १३८॥

 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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