श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 143: पाँच प्रकारके दानोंका वर्णन  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  13.143.10 
दीनश्च याचते चायमल्पेनापि हि तुष्यति।
इति दद्याद् दरिद्राय कारुण्यादिति सर्वथा॥ १०॥
 
 
अनुवाद
यह बेचारा बहुत दरिद्र है और मुझसे भीख मांग रहा है। मैं इसे थोड़ा-सा भी दे दूँ तो यह संतुष्ट हो जाएगा।’ ऐसा सोचकर दयापूर्वक दरिद्र को दान देना चाहिए॥10॥
 
This poor man is very poor and is begging from me. He will be satisfied even if I give him a little.' Thinking this, one should give charity to a poor man out of compassion.॥ 10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)