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श्लोक 13.142.32  |
यत्र ते नृपशार्दूल संदेहो वै भविष्यति।
श्व: प्रभाते हि वक्ष्यामि संध्या हि समुपस्थिता॥ ३२॥ |
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| अनुवाद |
| हे राजनश्रेष्ठ! अब जिस विषय में तुम्हें संदेह है, वह मैं कल प्रातःकाल तुम्हें बताऊँगा; क्योंकि अभी तो संध्या हो गई है। |
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| O best of kings! Now whatever you have doubts about, I will tell you about it tomorrow morning; because right now it is evening. |
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इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १३७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें एक सौ सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १३७॥
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