यत्र ते नृपशार्दूल संदेहो वै भविष्यति।
श्व: प्रभाते हि वक्ष्यामि संध्या हि समुपस्थिता॥ ३२॥
अनुवाद
हे राजनश्रेष्ठ! अब जिस विषय में तुम्हें संदेह है, वह मैं कल प्रातःकाल तुम्हें बताऊँगा; क्योंकि अभी तो संध्या हो गई है।
O best of kings! Now whatever you have doubts about, I will tell you about it tomorrow morning; because right now it is evening.
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १३७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें एक सौ सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १३७॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)