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mahabharat 13.141.6: सोने का दान लेने से, गायत्री मंत्र का जप करने से तथा काले लोहे का दंड खुले रूप से धारण करने से ब्राह्मण पाप से मुक्त हो जाता है ॥6॥   |   mahabharat अध्याय 13.141: दान लेने और अनुचित भोजन करनेका प्रायश्चित्त   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 141: दान लेने और अनुचित भोजन करनेका प्रायश्चित्त  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  13.141.6 
काञ्चनं प्रतिगृह्याथ जपमानो गुरुश्रुतिम्।
कृष्णायसं च विवृतं धारयन् मुच्यते द्विज:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
सोने का दान लेने से, गायत्री मंत्र का जप करने से तथा काले लोहे का दंड खुले रूप से धारण करने से ब्राह्मण पाप से मुक्त हो जाता है ॥6॥
 
By accepting donations of gold, by chanting the Gayatri Mantra and by openly wearing a black iron staff a brahmin is relieved of his sin. ॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)