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mahabharat 13.141.4: युधिष्ठिर! यदि कोई ब्राह्मण घी दान करता है, तो उसे गायत्री मंत्र का जाप करना चाहिए और अग्नि में समिधा अर्पित करनी चाहिए। तिलक दान करते समय भी यही प्रायश्चित करना चाहिए। ये दोनों कार्य समान हैं। 4॥   |   mahabharat अध्याय 13.141: दान लेने और अनुचित भोजन करनेका प्रायश्चित्त   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 141: दान लेने और अनुचित भोजन करनेका प्रायश्चित्त  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  13.141.4 
घृतप्रतिग्रहे चैव सावित्री समिदाहुति:।
तिलप्रतिग्रहे चैव सममेतद् युधिष्ठिर॥ ४॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर! यदि कोई ब्राह्मण घी दान करता है, तो उसे गायत्री मंत्र का जाप करना चाहिए और अग्नि में समिधा अर्पित करनी चाहिए। तिलक दान करते समय भी यही प्रायश्चित करना चाहिए। ये दोनों कार्य समान हैं। 4॥
 
Yudhisthira! If a Brahmin donates Ghee, he should recite Gayatri Mantra and offer Samidha in the fire. The same atonement should be done while donating Tilka. Both these tasks are similar. 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)