Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 13.141.25: किसी के घर या उसके साथ पंक्ति में बैठकर भोजन नहीं करना चाहिए। उपर्युक्त प्रायश्चित के विषय में किसी प्रकार का संशय नहीं होना चाहिए। तप करने के पश्चात गोरोचन, दूर्वा और हल्दी आदि शुभ वस्तुओं का स्पर्श करना चाहिए। 25॥   |   mahabharat अध्याय 13.141: दान लेने और अनुचित भोजन करनेका प्रायश्चित्त   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 141: दान लेने और अनुचित भोजन करनेका प्रायश्चित्त  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  13.141.25 
तथोच्छिष्टमथान्योन्यं सम्प्राशेन्नात्र संशय:।
रोचना विरजा रात्रिर्मङ्गलालम्भनानि च॥ २५॥
 
 
अनुवाद
किसी के घर या उसके साथ पंक्ति में बैठकर भोजन नहीं करना चाहिए। उपर्युक्त प्रायश्चित के विषय में किसी प्रकार का संशय नहीं होना चाहिए। तप करने के पश्चात गोरोचन, दूर्वा और हल्दी आदि शुभ वस्तुओं का स्पर्श करना चाहिए। 25॥
 
One should not eat food at someone's place or in a row with him. There should be no doubt about the above mentioned atonement. After doing penance, one should touch auspicious things like Gorochan, Durva and turmeric etc. 25॥
 
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि प्रायश्चित्तविधिर्नाम षट्‍‍त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १३६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें प्रायश्चित्तविधि नामक एक सौ छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १३६॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)