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mahabharat 13.141.21: जो ब्राह्मण वैश्यों के साथ एक ही पंक्ति में बैठकर भोजन करता है, वह तीन रात्रि तक उपवास करने पर उस कर्म के पाप से मुक्त हो जाता है ॥21॥   |   mahabharat अध्याय 13.141: दान लेने और अनुचित भोजन करनेका प्रायश्चित्त   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 141: दान लेने और अनुचित भोजन करनेका प्रायश्चित्त  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  13.141.21 
यस्तु वैश्यै: सहाश्नीयाद् ब्राह्मणोऽप्येकभोजने।
स वै त्रिरात्रं दीक्षित्वा मुच्यते तेन कर्मणा॥ २१॥
 
 
अनुवाद
जो ब्राह्मण वैश्यों के साथ एक ही पंक्ति में बैठकर भोजन करता है, वह तीन रात्रि तक उपवास करने पर उस कर्म के पाप से मुक्त हो जाता है ॥21॥
 
A Brahmin who eats in the same row with Vaishyas, becomes free from the sin of that action if he fasts for three nights. ॥ 21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)