श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 140: जिनका अन्न ग्रहण करने योग्य है और जिनका ग्रहण करने योग्य नहीं है, उन मनुष्योंका वर्णन  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  13.140.7 
शूद्रस्य कर्मनिष्ठायां विकर्मस्थोऽपि पच्यते।
ब्राह्मण: क्षत्रियो वैश्यो विकर्मस्थश्च पच्यते॥ ७॥
 
 
अनुवाद
यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य शूद्र के कर्मों में लगा रहता है, तो वह भी नरक में पकता है, भले ही वह संध्या-वंदन आदि विशेष कर्मों में ही क्यों न लगा हो। यदि वह शूद्र के कर्मों को न भी करे और शास्त्रविरुद्ध कर्मों में ही लगा रहे, तो भी उसे नरक की यातनाएँ भोगनी पड़ती हैं। 7॥
 
If a Brahmin, Kshatriya or Vaishya is engaged in the deeds of a Shudra, he is also cooked in hell even if he is engaged in special deeds like sandhya-vandan etc. Even if he does not perform the rites of a Shudra and continues to indulge in activities contrary to the scriptures, he still has to suffer the tortures of hell. 7॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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