श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d98
 
 
श्लोक  13.14.d98 
शुचिश्रवाय महते ऋतुसंवत्सराय च।
ऋग्यजु:सामवक्त्राय अथर्वशिरसे नम:॥
 
 
अनुवाद
उन नारायण देव को नमस्कार है जिनकी कीर्ति शुद्ध है, जो महान हैं और जो ऋतुओं और वर्षों के स्वरूप हैं, जिनके मुख ऋग्वेद, यजुः और सामवेद हैं तथा जिनका सिर अथर्ववेद है।
 
Salutations to that Narayana Deva whose fame is pure, who is great and who is the form of seasons and years, whose mouth is the Rigveda, Yajuh and Samaveda and whose head is the Atharvaveda.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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