श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d93
 
 
श्लोक  13.14.d93 
एवं चिन्तासमापन्न: प्रध्यातुमुपचक्रमे।
विनयावनतो भूत्वा नमश्चक्रे महात्मने॥
अनादिनिधनायैभिर्नामभि: परमात्मने।
 
 
अनुवाद
इस प्रकार चिन्तित होकर मैंने भगवान का ध्यान करना आरम्भ किया और नम्रतापूर्वक प्रणाम करके उन आदि-अन्त रहित परम पुरुष नारायण की निम्न नामों से प्रार्थना करने लगा।
 
Being thus worried, I began to meditate upon God; and bowing down with humility, I began to pray to the Supreme Being, Narayana, who is without beginning and end, by the following names:
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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