श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d91-d92
 
 
श्लोक  13.14.d91-d92 
ततस्तेष्वग्निहोत्रेषु ज्वलत्सु विमलार्चिषु।
भानुमत्सु न पश्यामि देवदेवं सनातनम्॥
ततोऽहं तानि दीप्तानि परीय व्यथितेन्द्रिय:।
नान्तं तेषां प्रपश्यामि येनाहमिह चोदित:॥
 
 
अनुवाद
वे अग्निहोत्र पहले की तरह ही शुद्ध ज्वालाओं से जल रहे थे। मुझे उनके आस-पास कहीं भी सनातन भगवान श्रीहरि दिखाई नहीं दे रहे थे। फिर मैं उन जलते हुए अग्निहोत्रों की परिक्रमा करते-करते थक गया। मेरी सारी इंद्रियाँ बेचैन हो गईं; लेकिन उनका कोई अंत नहीं दिख रहा था। मैं उस प्रभु को नहीं देख पा रहा था जिसने मुझे यहाँ आने के लिए प्रेरित किया था।
 
Those Agnihotras were burning with pure flames as before. I could not see the eternal God Shri Hari anywhere near them. Then I got tired of circling those burning Agnihotras. All my senses became restless; but there seemed to be no end to them. I could not see the Lord who had inspired me to come here.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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