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mahabharat 13.14.d85: यद्यपि घी उपलब्ध नहीं था, फिर भी उन अग्नियों की चमक घी से आहुति देने वाली अग्नि के समान थी और ईंधन के बिना भी, उनकी चमक ईंधन से भरी अग्नि के समान चमकती रही।   |   mahabharat अध्याय 13.14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d85
 
 
श्लोक  13.14.d85 
दीप्तिस्तेषामनाज्यानां प्राप्ताज्यानामिवाभवत्।
अनिद्धानामिव सतामिद्धानामिव भास्वताम्॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि घी उपलब्ध नहीं था, फिर भी उन अग्नियों की चमक घी से आहुति देने वाली अग्नि के समान थी और ईंधन के बिना भी, उनकी चमक ईंधन से भरी अग्नि के समान चमकती रही।
 
Even though ghee was not available, the brightness of those fires was like that of fires that had received ghee as offerings and even without fuel, their radiance continued to shine like that of a fire with fuel.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)