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श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d81
 
 
श्लोक  13.14.d81 
स तत्सर: समासाद्य भगवानात्मवित्तम:।
भो:शब्दप्रतिसृष्टेन स्वरेणाप्रतिवादिना॥
विवेश देव: स्वां योनिं मामिदं चाभ्यभाषत।
 
 
अनुवाद
उस सरोवर के पास पहुँचकर, आत्मा के तत्त्व को जानने वालों में श्रेष्ठ भगवान नारायण ने ‘भो’ शब्द से युक्त एक अनोखी गम्भीर वाणी से मुझे पुकारा और जल में अपने शयनस्थान में प्रवेश करके मुझसे इस प्रकार बोले -
 
Reaching that lake, Lord Narayana, the best among those who know the essence of the soul, called me in a unique deep voice containing the word ‘Bho’ and entered his sleeping place in the water and spoke to me thus -
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)