श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d72
 
 
श्लोक  13.14.d72 
श्रीभगवानुवाच
मम त्वं विदित: सौम्य यथावत् तत्त्वदर्शने।
ज्ञापितश्चापि यत् पित्रा तच्चापि विदितं महत्॥
 
 
अनुवाद
श्री भगवान बोले, "सौम्य! तुम्हें मेरे वास्तविक स्वरूप को जानने का प्रयास करना चाहिए। मैं यह पहले से ही जानता हूँ। तुम्हारे पिता ने तुम्हें मेरे विषय में जो भी ज्ञान दिया है, वह सब मैं जानता हूँ।"
 
Sri Bhagavan said- Soumya! You should try to realize my true nature in the true form. I already know this. Whatever knowledge your father has given you about me, I know it all.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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