श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d71
 
 
श्लोक  13.14.d71 
अहं तु तत्त्वजिज्ञासु: कोऽसि कस्यासि कुत्र वा।
सम्प्राप्त: पदवीं देव स मां संत्रातुमर्हसि॥
 
 
अनुवाद
मैं यह जानने की इच्छा से आपके चरणों में आया हूँ कि आप कौन हैं, किसके हैं और कहाँ रहते हैं। हे प्रभु! कृपया मेरी रक्षा करें।
 
I have come to your feet with the desire to know in detail who you are, whose you belong to and where you live. O Lord! Please protect me.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas