श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d69
 
 
श्लोक  13.14.d69 
सोऽहं प्रपन्न: शरणं देवदेवं सनातनम्।
प्राञ्जलिर्मनसा भूत्वा वाक्यमेतत् तदोक्तवान्॥
 
 
अनुवाद
तब मैंने मन ही मन उस सनातन भगवान की शरण ली और हाथ जोड़कर इस प्रकार कहा -
 
Then, I mentally took refuge in that eternal God and with folded hands spoke thus -
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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