श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d68
 
 
श्लोक  13.14.d68 
ततस्तत्र हरिं दृष्ट्वा जगत: प्रभवं विभुम्।
गोविन्दं पुण्डरीकाक्षं प्रणत: शिरसा हरिम्॥
ऋग्यजु:सामभिश्चैनं तुष्टाव परया मुदा।
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् मैंने जगत की उत्पत्ति के कारण सर्वव्यापी कमलनेत्र श्री गोविन्दहरिका का दर्शन करके मस्तक झुकाया और ऋक्, यजु तथा सामन्तों के मन्त्रों द्वारा बड़े आनन्द के साथ उनकी स्तुति की।
 
Thereafter, after seeing Shri Govind Harika, the omnipresent lotus eye who was the cause of the origin of the world, I bowed my head and praised him with great joy through the mantras of Rik, Yaju and Sammantras.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas