श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d65
 
 
श्लोक  13.14.d65 
तद्भावगतभावात्मा तद्भूतगतमानस:॥
गोविन्दं चिन्तयन्नास्से शाश्वतं परमव्ययम्।
 
 
अनुवाद
मेरा मन उनके भक्ति-भाव से भरे विचारों में डूबा हुआ था। उनका चिंतन करते-करते मेरा मन उनसे एकाकार हो गया था। इस प्रकार मैं सनातन और अविनाशी परमात्मा गोविंद के चिंतन में मग्न होकर बैठ गया।
 
My mind was immersed in his thoughts filled with devotion. My mind had become one with him while thinking about him. Thus I sat engrossed in the thoughts of the eternal and indestructible Supreme Being Govinda.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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