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श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d63-d64
 
 
श्लोक  13.14.d63-d64 
सोऽहमेवं भगवता पित्रा ब्रह्मर्षिसत्तमा:॥
अनुनीतो यथान्यायं स्वमेव भवनं गत:।
सोऽहमामन्त्र्य पितरं तद्भावगतमानस:॥
स्वमेवालयमासाद्य तमेवार्थमचिन्तयम्।
 
 
अनुवाद
हे ब्रह्मर्षि, हे ब्रह्माणी! अपने पूज्य पिता के द्वारा उचित प्रकार से समझाकर मैं अपने घर गया। पिता से विदा लेकर मैं घर आया और उसी परम पुरुष का ध्यान करने लगा।
 
O Brahmarshi, O Brahmani! After being properly explained by my respected father, I went to my home. After taking leave from my father, I came home and started meditating on the same Supreme Being.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)