श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d61
 
 
श्लोक  13.14.d61 
समासाद्य तु तं विश्वमहं मूर्ध्ना प्रणम्य च।
ऋग्यजु:सामभि: स्तुत्वा शरण्यं शरणं गत:॥
 
 
अनुवाद
उस विश्वात्मा को अपने निकट पाकर मैंने सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और ऋग्वेद, यजुः तथा साममंत्रों से उनकी स्तुति करके मैं उस ईश्वर की शरण में गया, जो शरणागतों पर दया करने वाला है।
 
Finding the Universal Soul near me, I bowed my head and paid my obeisance to him, and after praising him with Rigveda, Yajuh and the Sama-mantras, I went to the shelter of that God who is kind to those who seek refuge.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas