श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d6
 
 
श्लोक  13.14.d6 
ब्रह्मोवाच
त्वद्रूपचिन्तनान्नाम्नां स्मरणादर्चनादपि।
तपोयोगादिभिश्चैव श्रेयो यान्ति मनीषिण:॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्माजी बोले - हे प्रभु! आपके स्वरूप का चिन्तन करके, आपके नामों का स्मरण और कीर्तन करके, आपकी पूजा करके तथा तप और योग के द्वारा बुद्धिमान पुरुष कल्याण को प्राप्त होते हैं।
 
Brahmaji said - Lord! By thinking of your form, by remembering and chanting your names, by worshipping you and by penance and yoga, wise men achieve welfare.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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