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mahabharat 13.14.d57: तत्! मैं धन्य हूँ, मैं ईश्वर की कृपा का पात्र हूँ, क्योंकि तूने मेरे पुत्र होकर उस महान् मन वाले, गुप्त ईश्वर से वार्तालाप किया है।   |   mahabharat अध्याय 13.14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d57
 
 
श्लोक  13.14.d57 
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यत् त्वं तेन महात्मना।
संवादं कृतवांस्तात गुह्येन परमात्मना॥
 
 
अनुवाद
तत्! मैं धन्य हूँ, मैं ईश्वर की कृपा का पात्र हूँ, क्योंकि तूने मेरे पुत्र होकर उस महान् मन वाले, गुप्त ईश्वर से वार्तालाप किया है।
 
‘Tat! I am blessed, I am the recipient of God's grace, being whose son you have conversed with that great-minded, hidden God.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)