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श्लोक 13.14.d55  |
सोऽहं पितरमासाद्य प्रणिपत्याभिवाद्य च।
सर्वमेतद् यथातथ्यमुक्तवान् पितुरन्तिके॥ |
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| अनुवाद |
| अपने पिता के पास पहुंचकर मैंने उनके चरणों में प्रणाम किया और उन्हें पूरी घटना ज्यों की त्यों बता दी। |
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| On reaching my father, I bowed down at his feet and narrated the whole incident to him as it was. |
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