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mahabharat 13.14.d54: साधु-संतों! तत्पश्चात उन अनिर्वचनीय देवता से बातचीत करके मैं जिज्ञासावश अपने पिता कश्यपजी के पास गया।   |   mahabharat अध्याय 13.14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d54
 
 
श्लोक  13.14.d54 
ततोऽहं कृतसंवादस्तेन केनापि सत्तमा:।
कौतूहलसमाविष्ट: पितरं काश्यपं गत:॥
 
 
अनुवाद
साधु-संतों! तत्पश्चात उन अनिर्वचनीय देवता से बातचीत करके मैं जिज्ञासावश अपने पिता कश्यपजी के पास गया।
 
Saints and saints! After that, after talking to that indescribable deity, out of curiosity I went to my father Kashyapji.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)