श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d52
 
 
श्लोक  13.14.d52 
एवमेतन्महाबाहो सर्वमेतद् भविष्यति।
वाहनं ते भविष्यामि यथा वदति मां भवान्॥
ध्वजस्तेऽहं भविष्यामि रथस्थस्य न संशय:।
 
 
अनुवाद
महाबाहो! आप जो कह रहे हैं, वह ठीक है। यह सब आपकी आज्ञा से ही होगा। आप मुझे जो आदेश दे रहे हैं, उसके अनुसार मैं अवश्य ही आपका वाहन बनूँगा। जब आप रथ पर बैठेंगे, तो मैं आपकी ध्वजा पर विराजमान रहूँगा, इसमें कोई संदेह नहीं है।
 
‘Mahabaho! What you are saying is correct. All this will happen as per your orders. As per the orders you are giving me, I will definitely be your vehicle. When you will sit on the chariot, I will be sitting on your flag, there is no doubt about this.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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