श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d48
 
 
श्लोक  13.14.d48 
ततो जलदगम्भीरं प्रहस्य गदतां वर:।
उवाच वरद: प्रीत: काले त्वं माभिवेत्स्यसि॥
 
 
अनुवाद
तब वक्ताओं में श्रेष्ठ और वर देने वाले भगवान जोर से हंसे और प्रसन्नतापूर्वक मेघ के समान गम्भीर वाणी में बोले, 'समय आने पर तुम मेरे विषय में सब कुछ जान जाओगे।
 
Then the Lord, the best of speakers and the bestower of boons, laughed loudly and said happily in a voice as deep as a cloud, 'When the time comes, you will know everything about me.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas