श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d47
 
 
श्लोक  13.14.d47 
सुपर्ण उवाच
तामेवंवादिनीं वाचमहं प्रत्युक्तवांस्तदा।
ज्ञातुमिच्छामि कस्त्वं हि ततो मे दास्यसे वरम्॥
 
 
अनुवाद
गरुड़ कहते हैं - हे ऋषियों! आकाशवाणी सुनकर मैंने इस प्रकार उत्तर दिया - 'पहले मैं यह जानना चाहता हूँ कि आप कौन हैं। फिर कृपा करके मुझे वर दीजिए।'
 
Garuda says - O sages! On hearing such a voice from the sky, I replied like this - 'First I want to know who you are. Then please grant me a boon.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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