श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d40
 
 
श्लोक  13.14.d40 
जायन्ते तात तस्माद्धि तिष्ठते तेष्वसौ विभु:।
संचिन्त्य बहुधा बुद्‍ध्या नाध्यवस्यामहे परम्॥
तस्य देवस्य तत्त्वेन तन्न: शंस यथातथम्।
 
 
अनुवाद
हे प्रिये! ये सभी एक ही श्रीहरि से उत्पन्न हुए हैं और एक ही ईश्वर इन सबमें व्यापक रूप से विद्यमान है। हम अपनी बुद्धि से नाना प्रकार से उनका चिन्तन करते हैं, किन्तु किसी अच्छे निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाते, अतः कृपया हमें उनका वास्तविक स्वरूप बताइए।
 
O dear! All these are born from the same Shri Hari and the same God is present in all these in a pervasive form. We think about Him in various ways with our intellect but are unable to reach any good conclusion, so please tell us His essence in the true form.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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