श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d37
 
 
श्लोक  13.14.d37 
वेदेष्वपि च विश्वात्मा गीयते न च विद्महे।
तत्त्वतस्तत्त्वभूतात्मा विभुर्नित्य: सनातन:॥
 
 
अनुवाद
वेदों में भी उसे विश्वात्मा कहकर उसकी महिमा गाई गई है, परन्तु हम यह नहीं जानते कि वह सनातन और अनंत ईश्वर मूलतत्व रूप में क्या है?
 
Even in the Vedas, His glory has been sung by calling Him Vishwatma, but we do not know that what is that eternal and infinite God in the form of the essential elements?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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