श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d36
 
 
श्लोक  13.14.d36 
मुष्णन्निव मनश्चक्षूंष्यविभाव्यतनुर्विभु:।
अनादिमध्यनिधनो न विद्मैनं कुतो ह्यसौ॥
 
 
अनुवाद
उनका स्वरूप इन्द्रियों द्वारा प्रत्यक्ष अनुभव नहीं किया जा सकता। वे सबके मन और आँखों को हर लेते हैं। उनका न आदि है, न मध्य, न अंत। हम समझ नहीं पाते कि वे कहाँ से प्रकट हुए हैं।
 
Their form cannot be directly experienced by the senses. They seem to steal away everyone's mind and eyes. They have no beginning, no middle and no end. We are unable to understand from where they have appeared.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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