श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d35
 
 
श्लोक  13.14.d35 
एष भक्तप्रियो देव: प्रियभक्तस्तथैव च।
त्वं प्रियश्चास्य भक्तश्च नान्य: काश्यप विद्यते॥
 
 
अनुवाद
कश्यपकुमार! ये भगवान नारायण अपने भक्तों को प्रिय हैं और इनके भक्त भी इन्हें अत्यंत प्रिय हैं। आप भी इनके प्रियतम एवं भक्त हैं। इन्हें आपके समान अन्य कोई प्रिय नहीं है।
 
Kashyapkumar! This Lord Narayana is dear to his devotees and his devotees are also very dear to him and you are also his favourite and devotee. No one else is dear to him like you.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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