श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d30
 
 
श्लोक  13.14.d30 
ऋषय ऊचु:
कौतूहलं वैनतेय परं नो हृदि वर्तते।
तस्य नान्योऽस्ति वक्तेह त्वामृते पन्नगाशन॥
तदाख्यातमिहेच्छामो भवता प्रश्नमुत्तमम्।
 
 
अनुवाद
ऋषि बोले- विनतानंदन गरुड़! हमारे हृदय में एक प्रश्न को लेकर बड़ी जिज्ञासा उत्पन्न हुई है। आपके अतिरिक्त यहाँ कोई ऐसा नहीं है जो इसका समाधान कर सके, अतः हम चाहते हैं कि आप हमारे इस महान प्रश्न का स्पष्टीकरण करें।
 
The sage said- Vinatanandan Garuda! A great curiosity has arisen in our hearts about a question. There is no one here except you who can solve it, so we want you to explain our great question.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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