श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d25
 
 
श्लोक  13.14.d25 
पुरा ब्रह्मर्षयश्चैव सिद्धाश्च भुवनेश्वरम्।
आश्रित्य हिमवत्पृष्ठे चक्रिरे विविधा: कथा:॥
 
 
अनुवाद
पूर्वकाल में ऐसा हुआ था कि हिमालय की चोटी पर ब्रह्मऋषि और सिद्धगण भगवान हरि की शरण में थे और उनके विषय में नाना प्रकार की बातें कर रहे थे।
 
It happened in the past, on the peak of the Himalayas, the Brahmarishis and Siddhas had taken refuge in Lord Hari and were talking about various things regarding Him.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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