श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d200
 
 
श्लोक  13.14.d200 
ममाप्येषा कथा तात कथिता मातुरन्तिके॥
वसुभि: सत्त्वसम्पन्नै: तवाप्येषा मयोच्यते।
 
 
अनुवाद
पिताजी! बुद्धिमान वसुओं ने यह कथा मेरी माता गंगाजी के समक्ष मुझसे कही थी और अब मैंने इसे आपसे कहा है।
 
Father! The wise Vasus had narrated this story to me in the presence of my mother Gangaji and now I have narrated it to you.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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