श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d199
 
 
श्लोक  13.14.d199 
स्थूलदर्शिभिराकृष्टो दुर्ज्ञेयो ह्यकृतात्मभि:।
एषा श्रुतिर्महाराज धर्म्या धर्मभृतां वर॥
सुराणां ब्रह्मणा प्रोक्ता विस्मितानां परंतप।
 
 
अनुवाद
हे धर्मात्माओं में श्रेष्ठ महाराज युधिष्ठिर! जिन संकीर्ण बुद्धि वाले मनुष्यों का मन उनके वश में नहीं है, उनके लिए भगवान श्रीहरि के तत्त्व का ज्ञान प्राप्त करना अत्यंत कठिन है। यह एक धार्मिक श्रुति है। परंतप! ब्रह्माजी ने आश्चर्यचकित देवताओं को यह बात सुनाई थी।
 
Maharaja Yudhishthir, the best among the righteous souls! It is very difficult for narrow minded people whose mind is not under their control to have knowledge of the essence of Lord Shri Hari. This is a religious shruti. Parantap! Lord Brahma had narrated this to the astonished gods.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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