श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d186
 
 
श्लोक  13.14.d186 
स्थूलोऽहमेवं विहग त्वया दृष्टस्तथानघ॥
एतच्चापि न वेत्त्यन्यस्त्वामृते पन्नगाशन।
 
 
अनुवाद
हे भोले पक्षीराज गरुड़! इस प्रकार तुमने मेरा भौतिक रूप देखा है। किन्तु तुम्हारे अतिरिक्त अन्य कोई भी इस रूप को नहीं जानता।
 
O innocent bird king Garuda! In this way you have seen my physical form. But no one else except you knows this form.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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