श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d182
 
 
श्लोक  13.14.d182 
धर्ममर्थं च कामं च मोक्षं चैवार्जवं जपम्।
तम: सत्त्वं रजश्चैव कर्मजं च भवाप्ययम्॥
 
 
अनुवाद
धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, सरलता, जप, सत्व, तमो, रजो तथा कर्म से होने वाला जन्म-मृत्यु - ये सब मेरे ही स्वरूप हैं।
 
Dharma (righteousness), Artha (wealth), Kama (desire), Moksha (liberation), simplicity, Japa (chanting), Sattva (goodness), Tamo (goodness), Rajo (passiveness) and birth and death resulting from Karma – all are my forms.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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