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mahabharat 13.14.d181: मैं शरीर में प्राणों का रक्षक हूँ। मैं योगियों का ईश्वर हूँ। मैं सांख्यों का मूल तत्त्व हूँ। यह सम्पूर्ण जगत् मुझमें स्थित है।   |   mahabharat अध्याय 13.14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.14.d181 
प्राणपाल: शरीरेऽहं योगिनामहमीश्वर:।
सांख्यानामिदमेवाग्रे मयि सर्वमिदं जगत‍्॥
 
 
अनुवाद
मैं शरीर में प्राणों का रक्षक हूँ। मैं योगियों का ईश्वर हूँ। मैं सांख्यों का मूल तत्त्व हूँ। यह सम्पूर्ण जगत् मुझमें स्थित है।
 
I am the protector of life in the body. I am the God of the Yogis. I am the main element of the Sankhyas. This entire universe is situated in me.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)